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ध्रुव तारा की कथा

ध्रुव तारा की  कथा  ~~~~~~~~~~~~~~~ राजा उत्तानपाद ब्रह्माजी के मानस पुत्र स्वयंभू मनु के पुत्र थे। उनकी सनीति एवं सुरुचि नामक दो पत्नियाँ थीं.......... उन्हें सुनीति से ध्रुव एवं सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र प्राप्त हुए। वे दोनों राजकुमारों से समान प्रेम करते थे। यद्यपि सुनीति ध्रुव के साथ-साथ उत्तम को भी अपना पुत्र  मानती थीं, तथापि रानी सुरुचि ध्रुव और सुनीति से ईर्ष्या और घृणा करती थीं। वह सदा उन्हें नीचा दिखाने के अवसर ढूँढ़ती रहती थी। एक बार उत्तानपाद उत्तम को गोद में लिए प्यार कर रहे थे। तभी ध्रुव भी वहाँ आ गया। उत्तम को पिता की गोद में बैठा देखकर वह भी उनकी गोद में जा बैठा।  यह बात सुरुचि को नहीं जँची। उसने ध्रुव को पिता की गोद से नीचे खींचकर कटु वचन सुनाए। ध्रुव रोते हुए माता सुनीति के पास गया और सब कुछ बता दिया। वह उसे समझाते हुए बोली-“वत्स! भले ही कोई तुम्हारा अपमान करें, किंतु तुम अपने मन में दूसरों के लिए अमंगल की इच्छा कभी मत करना। जो मनुष्य दूसरों को दुःख देता है, उसे स्वयं ही उसका फल भोगना पड़ता है। पुत्र! यदि तुम पिता की गोद में बैठना चाहते...